हर लड़की के जन्म पर 10 आम के पेड़ लगाकर उत्सव मानते हैं यहां के लोग, अब बन चुकी है शानदार परंपरा

बेटियों को जब भी मौका मिला हैं उन्होंने सबको अपने काम से दिखाया है वे बेटों से काम नही है लेकिन फिर भी समाज में लोगों की चाहत बेटे की है. हाँ, पिछले कुछ सालों में लड़के – लड़की के बीच भेदभाव कम हुआ हुआ लेकिन अभी जो ख़ुशी बेटे के जन्म पर मनाई जाती है वो बेटी के जन्म पर नही मनाई जाती. ऐसे में बिहार के छोटे से गांव ने अपनी नई परंपरा से एक अच्छा संदेश दिया है.

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हम बात कर रहे हैं बिहार के भागलपुर जिले में एक छोटे से गांव धरहरा की. इस गांव के लोगों ने हम सबके सामने एक शानदार मिसाल पेश की है. इस गांव में बेटी के जन्म पर उत्सव मनाया जाता है और उसके स्वागत में कम से कम में 10 आम के पेड़ लगाये जाते हैं. अब तो आम के पेड़ लगा कर बेटी के पैदा होने का उत्सव मनाना इस गांव की परंपरा बन चुकी है.

जहां पूरी दुनिया भ्रूण हत्या और ग्लोबल वार्मिंग से जूझ रही है वहीं इस गांव ने अपनी इस अनोखी परंपरा से दोनों समस्याओं से निजात पाने का रास्ता दिखाया है. बेटी के जन्म पर कम से कम 10 पेड़ लगाये जाने से ये गांव आसपास के सबसे हरे भरे क्षेत्रों में गिना जाता हैं और जब बेटियां बड़ी होती हैं तो ये आम के पेड़ उन्हें विरासत के तौर पर सौंपे जाते हैं.

बेटी के जन्म पर आम के 10 पेड़ लगाना सिर्फ एक परंपरा ही नही है बल्कि गांव के लोगों की समझदारी भी है. बेटी के जन्म पर जिन आम के पेड़ों को लगाया जाता है वे बड़े होकर उनकी शिक्षा तथा भविष्य निर्माण के काम में आते हैं.

धरहरा के लोगों का कहना कहना है कि ये आम के पेड़ हम अपनी बेटियों को विरासत में देते है. जैसे-जैसे हमारी बेटियाँ बड़ी होती हैं वैसे-वैसे ये पेड़ भी बड़े हो जाते है. इन पेड़ों के फलों से ना केवल इन बेटियों के परिवार को मदद मिलती है बल्कि उनकी पढ़ाई और शादी का खर्चा भी निकल जाता है.

आम का पेड़ तैयार होने में 4-5 साल का समय लेता है लेकिन उसके बाद ये पेड़ हर साल भरपूर मात्रा में फल देते हैं जिन्हें बेचकर अच्छी आमदनी हो जाती है और फिर जब ये पेड़ वृद्ध हो जाते हैं तो इन्हें काटकर इनकी लकड़ी से फर्नीचर बनवा लिया जाता है. इस गांव के पे परंपरा हम सबको यही संदेश देती है – बेटियों को वरदान मानें और पेड़ों को पूंजी जाने.