वंशवाद की जय हो! राहुल गाँधी का अध्यक्ष बनना तय

हमारे देश की राजनीति में वंशवाद या परिवारवाद कोई नई बात नहीं है, लेकिन राहुल गाँधी का कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद पर ताजपोशी के कारण यह मुद्दा फिर से चर्चा का विषय बन गया है.पिछले कुछ सालों से कांग्रेस में राहुल गाँधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाये जाने की कोशिश की जा रही थी. इस दौरान अध्यक्ष पद के लिये उपयुक्त लीडर खोजने के बजाय राहुल गाँधी को ही ऐसे प्रेजेंट किया गया कि वर्तमान समय में सिर्फ राहुल गाँधी ही कांग्रेस को लीड कर सकते हैं.

1885 में कांग्रेस के बनने से लेकर अब तक के 132 साल के इतिहास में नेहरू-गांधी परिवार से 5 पार्टी अध्यक्ष बन चुके है. राहुल गाँधी के अध्यक्ष बनने के साथ ही ये संख्या 6 हो जाएगी.

नेहरू-गांधी परिवार से सबसे पहले मोतीलाल नेहरू पहली बार 1919 में कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष बने थे. उसके बाद उनके बड़े बेटे और देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू 1929 में पहली बार कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष बने. उसके बाद तीसरी पीढ़ी में इंदिरा गांधी ने पहली बार 1959 में कांग्रेस की कमान संभाली. उसके बाद इंदिरा 1978 से 1984 तक लगातार पार्टी की अध्यक्ष रहीं. उसके बाद चौथी पीढ़ी में राजीव गांधी और सोनिया गांधी दोनों पार्टी के अध्यक्ष रहे.

इंदिरा गांधी के निधन के बाद 1985 में राजीव गांधी पार्टी अध्यक्ष बने और लगातार ताउम्र पार्टी अध्यक्ष रहे. 1991 में राजीव गांधी की एक चुनावी रैली में हत्या कर दी गई. राजीव के निधन के बाद पार्टी अध्यक्ष की कमान सात साल तक परिवार से बाहर पीवी नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी से होते हुए 1998 में एक बार फिर नेहरू गांधी की चौथी पीढ़ी के हाथों में सौंपी गई. सोनिया गांधी पार्टी की अध्यक्ष बनीं.

नेहरू-गांधी परिवार में सबसे लंबा कार्यकाल सोनिया गांधी का ही है. वो लागातार 19 सालों से पार्टी की अध्यक्ष पद पर विराजमान हैं. अब पांचवीं पीढ़ी के छठे शख्स के हाथों में कांग्रेस की कमान जाती दिख रही है. राहुल गांधी के लिए अध्यक्ष पद का मिलना अब महज़ औपचारिक घोषणा बाकी रह गई है.

हमारे देश में परिवारवाद की बीमारी सिर्फ कांग्रेस को ही नहीं लगी है. वामपंथी दलों, आम आदमी पार्टी व जेडीयू को छोड़कर अन्य सभी पार्टियों को ये बीमारी लग चुकी है. हालांकि आम आदमी पार्टी के बारे में अभी कुछ कहा नही जा सकता है,क्योंकि वह अभी नई पार्टी है, उसकी आने वाले समय में क्या हालत रहेगी कुछ कह नही सकते.

वैसे तो बीजेपी परिवारवाद को लेकर कांग्रेस पर बहुत ही हमलावर होती है,परन्तु वह खुद भी इससे अछूती नहीं है. बीजेपी में भी इसके कई उदाहरण है.जैसे – कल्याण सिंह राज्यपाल हैं, उनके बेटे राजवीर सिंह एटा से सांसद हैं और नाती संदीप सिंह विधायक हैं. राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह भी विधायक हैं. कैसरगंज के सांसद बृजभूषण सिंह के बेटे प्रतीक भूषण, लालजी टंडन के बेटे आशुतोष टंजन विधायक हैं. योगी मंत्रिमंडल में मंत्री रीता बहुगुणा जोशी भी परिवारवाद की उदाहरण हैं.वसुंधरा राजे, जयंत सिन्हा, अनुराग ठाकुर, पीयूष गोयल सहित अनेक नेता पारिवारिक पृष्ठभूमि से आते हैं.

जो सवाल कांग्रेस, बीजेपी से भी पूछा जाना चाहिए, वही सवाल समाजवादी पार्टी, RJD, शिवसेना व अन्य दलों से भी पूछा जाना चाहिए. जवाब कोई नहीं देता है. क्या बीजेपी में कोई ऐसा नियम है कि जिनके पिता मुख्यमंत्री, मंत्री या सांसद रहे हैं वे कभी पार्टी अध्यक्ष या प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे, क्या बीजेपी ने ऐसा कहा है. क्या जिन दलों में अध्यक्ष किसी परिवार का नहीं बनता है, वहां ज्यादा आंतरिक लोकतंत्र है, जवाब है नहीं.

वंशवाद की जो यह बीमारी हमारे देश की राजनीति को लगी हुई है, यह हमारे लोकतंत्र की बुनियाद के लिये बहुत बड़ा खतरा है. ये ऐसे ही चलता रहा तो आने वाले समय में सता कुछ परिवारो से हाथो में सिमट जायेगी और लोकतंत्र महज परिवारतन्त्र बनकर रह जायेगा.

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